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कोरोना से किस प्रकार बंटाधार हुई अर्थव्यवस्था , पढ़िए कॉलम विशेष

New Delhi

130 करोड़ जनसंख्या वाले भारत की अर्थव्यवस्था की गणना दुनिया में कुछ समय पहले तक सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में होती थी। सरकार अर्थव्यवस्था को 2025 तक 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का संकल्प लेकर लक्ष्य सिद्धि के लिए प्रतिबद्ध थी। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर आर्थिक सुधार के दृष्टिकोण से ही नोटबंदी एवं वस्तु एवं सेवा कर जीएसटी लागू किया गया। अर्थशास्त्रियों ने सरकार के इस कदम को स्वतंत्रता के पश्चात सबसे बड़ा आर्थिक सुधार माना।
2019-2020 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 4.18 प्रतिशत था तथा 2020-21 में अर्थव्यवस्था में तेजी आने के आसार थे। परंतु मुश्किल झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कोरोना महामारी अभिशाप बनकर सामने आया। आजादी के बाद देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा संकुचन 2020-21 में – 7.3 प्रतिशत दर्ज की गई। 1979-80 में भी अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका लगा था। देश की जी.डी.पी. तब भयानक सुखार एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में वृद्धि के कारण 5.2 प्रतिशत तक गिर गई थी। तब भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि आधारित हुआ करती थी। वर्तमान की परिस्थिति अलग है मानसून भी अच्छा रहा तथा कोरोना वायरस के कारण विगत वर्षो की अपेक्षा 2020-21 में कच्चे तेल के दामों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी गिरावट दर्ज की गई। विदेशी मुद्रा भंडार भी इस बार लबालब भरा हुआ है। परंतु लॉकडाउन में उद्योगों के बंद होने तथा रिवर्स माइग्रेशन की वजह से अर्थव्यवस्था गोता लगा रहा है। ऑटोमोबाइल सेक्टर, पर्यटन, उद्योग ,असंगठित क्षेत्र, रियल एस्टेट, उत्पादन, सेवा सभी क्षेत्रों में सुस्ती छाई हुई है। एमएसएमई तो अपने अस्तित्व की लड़ाई लङ रहा है। 59% स्टार्टअप और एमएसएमई उद्योग फंड की कमी के कारण बंद होने के कगार पर हैं।
स्वतंत्र सर्वे के मुताबिक पिछले एक साल में 23 करोड लोग गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं। सेंटर फॉर इंडियन इकोनामी सीएमआईई के ताजा आंकड़े बताते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर में जनवरी से लेकर अब तक एक करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए हैं। बार्कलेज और एसबीआई के रिसर्च के अनुसार दुसरी लहर से अर्थव्यवस्था को लगभग 4.5 लाख करोड़ से 5.5 लाख करोड़ की चोट पहुंच सकती है। आईएमएफ,मूडीज, वर्ल्ड बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत की आर्थिक वृद्धि दर में कटौती की है। बार्कलेज के मुताबिक मई के हर हफ्ते इकोनॉमी को 8 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है जो अप्रैल के आखिरी 2 हफ्ते में हुए नुकसान 5.3 अरब डॉलर से कहीं अधिक है। बार्कलेज ने वृद्धि दर को भी 10% से घटाकर 9.2% कर दिया है। हालांकि फार्मा एफएमसीजी एवं कृषि क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई है। कृषि क्षेत्र में 3.9% वृद्धि दर का मुख्य कारण रिवर्स माइग्रेशन के वजह से 90 लाख लोगों का कृषि से जुड़ जाना तथा अच्छा मानसून बताया जाता है।
बेरोजगारी दर भी विगत वर्षो की अपेक्षा अपने चरम पर है।बेरोजगारी का सबसे ज्यादा मार असंगठित क्षेत्र के लोगो जैसे परिवहन उद्योग, मत्स्य पालन, छोटे दुकानदार, देहाङी मजदूर रेहङी वाले ,कपड़े, सिलाई उद्योग एवं अन्य पर पड़ा है। इनका काम के बारे में किसी से कोई लिखित करार नहीं होता ।अक्सर ये लोग सरकारी आंकड़ों से बाहर होते हैं।
बाजार में मांग लगातार कम हो रही है। मध्यम वर्गीय वर्ग संकट की इस घड़ी में अपने जरूरतों को पूरा करने के अलावा ज्यादा पैसे खर्च करना नहीं चाह रहा। ऐसे में सरकार को बाजार में तेजी लाने के लिए प्रयास करना चाहिए जिससे मांग और आपूर्ति दोनों में पर्याप्त संतुलन बना रहे। सरकार चाहे तो पेट्रोल डीजल एवं एलपीजी पर लग रहे टेक्सों में कटौती कर सकती है। इससे बाजार में खुदरा महंगाई पर काबू करने के साथ-साथ परिवहन क्षेत्र को भी नई उड़ान भरने का संभावना मिलेगा। ओपेक देशों के तत्कालिक मीटिंग से सरकार को यह उम्मीद जगी थी ओपेक तेल उत्पादन को बढ़ाएंगे। जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में कटौती होगी परंतु ओपेक देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को देखते हुए कच्चे तेल उत्पादन में तुरंत वृद्धि के बजाय चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने का फैसला किया।
सरकार को नए निवेश को प्रोत्साहित कर उद्योगों के लिए तत्काल प्रभाव से राहत पैकेज का एलान कर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए यथासंभव प्रयास करने चाहिए। अर्थव्यवस्था का पहिया तीव्र गति से घूमे इसके लिए टीकाकरण अभियान में तेजी लाने के साथ-साथ चरणबद्ध तरीके से लॉकडाउन हटाने का प्रयास भी आवश्यक है। अर्थशास्त्रियों,विशेषज्ञो, नीति निर्माताओं,उद्योगपतियों तथा सरकार को अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। वृहत आर्थिक सुधार छोटे उधोगों को ध्यान में रख कर निरंतर करना होगा। सरकार बुनियादि ढाँचे को मजबूत करने के लिए बङे परिपेक्ष्य में सङक निर्माण तथा विनिर्माण के जुङे प्रोजेक्ट को मंजूरी देने के साथ साथ पुराने लंबित पङे प्रोजेक्ट को भी यदि तेजी से शुरु करवाने में सफल होती है तो विनिर्माण क्षेत्र के लिए प्रगति के रास्ते प्रशस्त होंगे। मध्यमवर्गीय लोगो के लिए आर.बी.आई रेपो रेट घटा सकता है। इन प्रयासों से अर्थव्यवस्था में गति आएगी ।

लेखक

विक्की गौतम

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