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क्या हम महिलाओं के प्रति निष्पक्ष हैं , पढ़िए संपादकीय विशेष !

क्या हम अपनी महिलाओं के प्रति निष्पक्ष हैं?
लड़कियों के विवाह की निम्नतम आयु तय करने के पीछे यह उद्देश्य है कि उन्हें वित्तीय, शारीरिक , सामाजिक और भावानात्मक तौर पर शक्तिशाली बनाया जा सकें । इस्लाम में औरतों को कुछ सहूलियतें इसलिए दी गई है ताकि वे उचित शिक्षा प्राप्त कर सके और अपने पिता और पति की संपत्ति में अपना हिस्सा प्राप्त कर सके । सभी मुसलमान इस्लाम के सिद्धांतों के अंतर्गत अपनी बेटियों और पत्नी के साथ शिक्षा एवं बेहतरीन व्यवसाय उपलब्ध करवाने हेतु पुरुषों की भाँति ही समान व्यवहार करने के लिए बाध्य होते हैं । एक आंकड़े के अनुसार , शीघ्र विवाह के कारण भारत में लड़कियाँ अपनी शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाती, उन्हें तरह तरह की बीमारियां लग जाती हैं , वे कुपोषित हो जाती है जिसके कारण मातृत्व मृत्यु दर में कई गुना बढ़ोतरी हो जाती है । इस्लाम ऐसी किसी धारणा की पैरवी भी नहीं करता , जो औरतों के उत्थान और सशक्तिकरण को बाधा पहुँचाती है ।


इस्लाम का मुख्य केन्द्र बिन्दु शिक्षा प्राप्ति पर है क्योंकि यही वह सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसके द्वारा इस्लाम में निहित सिद्धांतों की प्राप्ति की जा सकती है । हज़रत मोहम्मद ने कहा है कि ‘शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक मुसलमान के लिए बेहद ज़रूरी है’ ।विवाह की आयु को बढ़ाने के पीछे यही उद्देश्य है कि लड़कियों को उचित शिक्षा प्राप्त हो सके । किंतु भारत मे प्रत्येक धर्म में होने वाले जल्दी विवाह की व्याप्त पुराने प्रथाओं के कारण औरतें इन उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर पाती । जब लड़कियाँ उचित आयु में विवाह करती है तो वे अपने परिवार और बच्चों की देखभाल करने के लिए पूरी तरह से स्वस्थ होती हैं । इस्लाम ऐसे क़ानून को समर्थन देता है जो लड़कियों को अर्थपूर्ण और समृद्ध जीवन जीने में सहायता करता है । इस्लामी सिद्धांत लड़कियों के विवाह की कोई उम्र निश्चित नहीं करते बल्कि इनके अनुसार लड़कियों को मातृत्व की ज़िम्मेदारी उठाने तथा बच्चों का लालन लालन पालन करने योग्य होना चाहिए, ताकि समाज में अपना योगदान दे सकें । विवाह की आयु कम से कम निश्चित करना राष्ट्र -दर -राष्ट्र भिन्न हो सकता है जो वहाँ व्याप्त जैविक परिस्थितियों तथा वहाँ के लोगों की नस्ल और उनके रीति -रिवाज़ों पर आधारित हो सकती है । भारतीय मुसलमानों को यह समझना चाहिए कि जो बिना धार्मिक मतभेद के यहाँ की प्रत्येक लड़की के लिए फ़ायदेमंद और लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं । कमोबेश , इस्लाम ने हमेशा ही औरतों के विकास व बेहतरी के सिद्धांत का समर्थन किया है।

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