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मातृभूमि की सेवा करना ही इस्लाम का एक हिस्सा, पढ़िए संपादकीय कॉलम !

भारतीय सशस्त्र सेनाएं: मुस्लिम
नौजवानों के लिए बेहतरीन मौका—-
‘इस्लाम’ में अपनी मातृभूमि के प्रति वफादारी करना धर्म का ही एक हिस्सा है। इस्लाम में अपने धर्म का पालन करने और अपने देश के
प्रति वफादार होने में कोई फर्क नहीं है। कुरान कहती है “ऐ ईमानवालों!
अल्लाह को मानो और पैगम्बर को भी मानो और उसको भी मानो जो
तुम्हारे बीच अधिकार रखता हो (4:60)” अपने देश और इसके लोगों को प्यार करना एक अच्छे मुसलमान की निशानी है। हजरत मोहम्मद ने कहा है “अपने देश के प्रति प्यार (देशभक्ति) तुम्हारे धर्म का हिस्सा है।” एक सच्चा मोमीन (मुसलमान) अपने देश से बेहद प्यार करता है व इसके हितों की रक्षा करने के लिए कार्य करता है। इसके विपरीत, जो अपने देश से प्यार नहीं करते, वे अहसानफरामोश हैं। वे गद्दारी की भावना से ग्रस्त होते हैं और इस तरह के लोग न तो सच्चे-पवित्र और न ही सच्चे मुसलमान नहीं होते हैं।

  मुसलमानों में, भारतीय सेनाओं में भर्ती होने के प्रति कुछ आशंकाएं

हैं। इसकी वजह अज्ञानता और उनमें विश्वास की कमी होना है। इस प्रकार की मिथ्याओं को सबूत और तथ्यों से दूर करने की जरूरत है ताकि भारतीय सेना की सही छवि प्रस्तुत की जा सके। भारतीय-फौज में
भारतीय मुसलमानों की नुमाईन्दगी एक बहस का मुद्दा रही है और उन
कारणों को जानना जरूरी है जिसकी
वजह से ऐसा हो रहा है। भारतीय-फौज में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों , अनुसूचित
जनजातियों के लिए किसी प्रकार का आरक्षण नहीं है। इसके लिए एक
अनूठी ‘प्रतिनिधित्व-व्यवस्था’ लागू है जो क्षेत्रीय संतुलन को बनाए रखने
के लिए की गई है और जिसका आधार RMPI (Recruitable Male Population Index) – भर्ती योग्य पुरुष जनसंख्या सूची है जिसके द्वारा क्षेत्रीय-वितरण को सुनिश्चित किया जाता है व किसी धर्म या जाति के प्रति कोई पक्षपात नहीं किया जाता। यह अधिकारी श्रेणी से निचले स्तर तक लागू होता है। अधिकारी स्तर पर यह सबके लिए खुली प्रतियोगिता है – जो योग्य हैं, उन्हें चुन लिया जाता है।
भारतीय-स्वतंत्रता-संग्राम इतिहास ऐसे अनेकों मुस्लिम
अधिकारियों से भरा पड़ा है जो बहुत ऊंचे पर्दो पर पहुंचे। भारतीय सेना
मे अभी तक नौ मुस्लिम ‘मेजर-जनरल’ रैंक के अधिकारी हुए हैं जबकि वायुसेना को एक बार ‘एयर-चीफ-मार्शल’ ने कमाण्ड किया है। भारतीय सेना अकादमी (IMA) में एक मुस्लिम-कमाण्डेंट जबकि राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में दो कमाण्डर हुए हैं। इन आंकड़ों में दिनोंदिन सकारात्मक वृद्धि होगी और जहां तक भारतीय सशस्त्र सेनाओं का इस बात को साबित करने का प्रश्न है, तो ‘आकाश अंतिम सीमा है’ (Sky is the limit). भारतीय मुसलमानों को बड़ी तादाद में आगे आना चाहिए और इस उत्कृष्ट व पूर्णतः व्यावसायिक सेना का हिस्सा बनकर अपनी मातृभूमि की सेवा करनी चाहिए।

 जहां भी सेना  में मुसलमान मौजूद हैं, वहां नियम के अनुसार उनका धार्मिक मार्गदशन करने के लिए एक धार्मिक शिक्षक की तैनाती अनिवार्य है। जहां कहीं भी मुस्लिम सिपाहियों की उप-यूनिट होती है, वहां मंदिर, गिरजाघर और गुरुद्वारा की भांति ही एक मस्जिद का होना भी अनिवार्य है। अगर किसी अखिल भारतीय स्तर की मिली-जुली फौजी-यूनिट में मुसलमान भी तैनात हैं तो वहां पर एक 'सर्वधर्म-स्थल' स्थापित किया जाता है जहां सैनिकों को 'बहुधर्मों के अस्तित्व' की अच्छाइयां सिखाई जाती हैं जो असली भारत की तस्वीर पेश

करती हैं। सेना ऐसा अपने सैनिकों के लिए करती है जिससे उसकी
‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘सहिष्णु-संस्कृति’ झलकती है।
भारतीय सशस्त्र सेनाओं के अधिकारियों के लिए एक ही कानून है कि बेशक वे अपना धर्म निभाएं किन्तु सैनिक का धर्म, उसको कमाण्ड करने वाले अफसर का धर्म भी बन जाता है। वैसे तो मुस्लिम नौजवान हर तरफ नौकरियों की तलाश में रहते हैं किन्तु भारतीय सशस्त्र सेनाओं के विभिन्न कैडरों में भर्ती होने से वे झिझकते हैं। भारतीय सेनाएं भारत के सामाजिक-तानेबाने को मजबूत करने में अपना बहुत बड़ा योगदान दे सकती हैं अतः मुस्लिम नौजवानों को इनमें भर्ती होकर इसका हिस्सा बनने में गर्व महसूस करना चाहिए।


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Assistant Editor

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