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महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अब्दुल कलाम आजाद की जयंती पर जानिए उनके जीवन से जुड़ी बड़ी बातें

New Delhi

Dev

मौलाना अबुल कलाम आजाद (11 नवंबर, 1888 – 22 फरवरी, 1958) देश के उन नेताओं में से एक थे जो इस्‍लाम को तो मानते थे लेकिन कट्टरता के विरोधी थे। यही वजह थी कि आजादी के आंदोलन में भाग लेते हुए उन्‍होंने उन मुस्लिम नेताओं की कड़ी आलोचना की जो देश की आजादी के लिए चलाए जा रहे आंदोलन को सांप्रदायिक रंग को चोला ओढ़ कर देखते थे। उन्होंने 1905 में अंग्रेजों द्वारा किए गए बंगाल के विभाजन का जबरदस्‍त विरोध किया। इतना ही नहीं उन्‍होंने ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के अलगाववादी विचारधारा को भी सिरे से खारिज करने में कोई देर नहीं लगाई। आजादी के बाद वे भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के रामपुर जिले से 1952 में सांसद चुने गए और वे भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने। वो इस पद पर 1947-1958 तक रहे थे। उन्‍होंने देश के उज्‍जवल भविष्‍य के लिए शिक्षा को शिक्षित होने को पहली प्राथमिकता माना था। इसके लिए उन्‍होंने काफी प्रयास भी किया। वे करीब 11 वर्षों तक देश के शिक्षा मंत्री के पद पर रहे। उन्‍हें ही देश में आईआईटी यानी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना भी की। इसके अलावा उन्‍हें शिक्षा और संस्कृति को विकसित करने के लिए उत्कृष्ट संस्थानों की स्थापना करने का भी श्रेय दिया जाता है। मौलाना आजाद भारत के स्‍वतंत्रता संग्राम से जुड़े थे। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। एक कवि, लेखक और पत्रकार के तौर भी उनकी तूंती बोलती थी। वो अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन के नाम से भी जाने जाते हैं। उनका संबंध उन अफगानी उलेमाओं के खानदान से था जो कभी बाबर के समय में भारत आए थे। उनकी मां भी अरबी मूल की ही थीं और उनके पित मोहम्मद खैरुद्दीन फारसी थे। उन्‍हें पढ़ाई में विशेष रूचि थी इसलिए वो केवल इस्‍लामिक शिक्षा तक ही सीमित नहीं रह सके। उन्‍होंने इसके अलावा गणित, दर्शनशास्त्र, इतिहास की शिक्षा हासिल की। आजाद को उर्दू, फारसी, हिंदी, अरबी और इंग्लिश में महारथ हासिल थी। आजाद आधुनिक शिक्षावादी सर सैय्यद अहमद खां के विचारों से काफी प्रभावित थे।

जब अंग्रेज़ सरकार ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को बंगाल से निष्काषित कर दिया था तब 1916 से 1919 तक वो रांची में नज़रबंद रहे, इस दौरान रांची की जामा मस्जिद में जुमा का ख़ुतबा देते रहे, उन्होंने अपने ख़ुत्बों में कहा के जंग ए आज़ादी में हिस्सा लेना मुसलमानों का दीनी फ़रीज़ा है, उनके ख़ुत्बों के प्रभाव से रांची के मुसलमानों ने आज़ादी की लड़ाई में पुरे जोशो जज़्बे के साथ भाग लेना शुरू कर दिया, इसके असर से रांची के हिन्दुओं ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से कहा के वो भी उनका भाषण सुनेंगे, अंग्रेज़ सरकार ने उनके सार्वजनिक भाषण पर पाबंदी लगा रखी थी इसलिए मस्जिद में ही एक कमरा बनाया गया जहाँ शहर के हिन्दू जुमा का ख़ुतबा सुनने के लिए आने लगे। शायद ये भारतीय इतिहास की पहली घटना रही होगी जब हिन्दू भी जुमा का ख़ुतबा सुनने मस्जिद में आते रहे हों। उन्ही दिनों जब दिल्ली में किसी हिन्दू धर्मगुरु के मस्जिद में आने पर मुसलमानों में से कुछ लोगों ने ऐतराज़ किया तब मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने एक किताब लिखी “जामीउस शवाहिद” (कलेक्शन ऑफ़ प्रूफ़) और फिर ये साबित किया के इस्लाम में गैरमुस्लिमों के मस्जिद में आने पर कोई पाबन्दी नहीं है। हिन्दू मुस्लिम के बीच की दूरियों को ख़त्म करने की उनकी कोशिशें भारतीय इतिहास का अभिन्न हिस्सा है। अपने पुराने कारनामों के बारे में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कहते हैं ये अम्र वाक़ेया है के “अलहिलाल” ने तीन साल के अंदर मुसलमानान ए हिन्द की मज़हबी और सियासी हालत में बिलकुल एक नई हरकत पैदा कर दी।

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