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सहनशीलता कैसे है एक दिव्य गुण , पढ़िए संपादकीय विशेष मे

सहनशीलता एक दिव्य गुण है जो शांति और सौहार्द्र सुनिश्चित करता है- सहनशीलता एक ऐसा गुण है जिसे हम सब को अल्लाह ने दिया है और इसे मनुष्य को आगे पोषित करने की जरूरत है क्योंकि, यह मनुष्य के अंदर जागृति लाती है जो उसे अपने दुखों पर बिना गुस्सा हुए सहने की ताकत देती है। प्रसिद्ध कवि रूमी ने सहनशीलता के बारे में कहा है- सहनशीलता प्रशंसा की आत्मा है अपने अंदर सहनशीलता पैदा करो क्योंकि यही असली प्रसिद्धि है। इससे अधिक कोई प्रसिद्धि नहीं है। सहनशीलता पैदा करो,यह दर्द की दवा है, और एक मशहूर कवि मसनवी ने कहा है, सहनशीलता कामयाबी की कुंजी है। इस सहनशीलता का उपचार तुम्हारी आंखों पर पड़े पर्दे को जला देगा और तुम्हारे दिल को खोल देगा। जब तुम्हारे दिल का शीशा साफ और शुद्ध हो जाएगा तो तुम पानी और धरती से बनी इस दुनिया से परे भी देख सकोगे। तुम इस छवि और इसके बनाने वाले दोनों को पा सकोगे तथा
आध्यात्मिक दुनिया और जो इसे फैलाता है दोनों को ही पाने में कामयाब होगै।
कुरान बार-बार सहनशीलता के महत्व पर जोर देती है। ईश्वर उन्हीं के साथ है जिनके पास सब्र और सहनशीलता है, दरअसल सहनशीलता उस परवरदिगार का ही एक रूप है। सच में ईश्वर उन्हीं के साथ है जो स्वयं के प्रति सहनशील/जानकार है और जो भला करते हैं। अल्लाह के 19 नामों में से एक नाम भी है-अस- सबर, इसका अर्थ है सहनशीलता जो कि एक दिव्य गुण है जिसे पूरी तरह से आत्मसात और अपनाने की जरूरत है। यह करुणा दया और दूसरों के कल्याण की तरह ही सर्वोत्तम गुणों में से एक है।
संक्षेप में कहें तो आधुनिक दुनिया एक सांचे की भांति है जहां हमारा अहम, हमारी सहनशीलता, हमें ऐसी अनुभूति पहले से ही होने की याद दिलाती रहती है। वैसे ईश्वर उनके साथ है जिनका उसके ऊपर सर्वाधिक सहनशीलता के साथ अटूट विश्वास है।

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