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आज शहीद – ए – आजम भगत सिंह का जन्मदिवस है , आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं के बारे मे

नई दिल्ली 

 

आज शहीद – ए – आजम भगत सिंह का जन्मदिवस है और आज इस विशेष कॉलम के तहत हम आपको बताएंगे भगत सिंह के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं के बारे मे जो भगत सिंह के जीवन से जुड़े हुए हैं  !

“मेरा धर्म सिर्फ देश की सेवा करना है।”-अमर शहीद भगत सिंह

जन्म: 28 सितम्बर, 1907
निधन: 23 मार्च, 1931
जन्मस्थल : गाँव बावली, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में)
मृत्युस्थल: लाहौर जेल, पंजाब (अब पाकिस्तान में)
आन्दोलन: भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम

“मैं जोर देकर कहता हूँ कि मेरे अंदर भी अच्छा जीवन जीने की महत्वकांक्षा और आशाएं हैं लेकिन मैं समय की माँग पर सब कुछ छोड़ने को तैयार हूँ यही सबसे बड़ा त्याग है”
ये कथन शहीदे आज़म भगत सिंह का है, जो देश के लिए उनके बलिदान और त्याग को बयां करता है. देश की आजादी में लाखों लोगों ने अपने प्राण न्योछावर किये थे उन्ही महान सेनानियों में शहीद भगत सिंह भी एक थे.

उसे यह फ़िक्र है हरदम, नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें, सितम की इंतहा क्या है?

दहर से क्यों खफ़ा रहे, चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही,आओ मुकाबला करें।

कोई दम का मेहमान हूँ,ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ, बुझा चाहता हूँ।

मेरी हवाओं में रहेगी, ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी, रहे, रहे न रहे।

आजादी के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले भगत सिंह हर हिन्दुस्तानी के दिल में बसते हैं। भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था। 1921 में जब चौरा-चौरा हत्याकांड के बाद गांधीजी ने किसानों का साथ नहीं दिया तो भगत सिंह पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। उसके बाद चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में गठित हुई गदर दल के हिस्सा बन गए। उन्होंने चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया।
८ अप्रैल १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय विधान सभा सत्र के दौरान विधान सभा भवन में बम फेंका। इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने “इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!” का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।
7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, सुख देव और राज गुरु को विशेष न्यायलय द्वारा मौत की सजा सुनाई गयी। भारत के तमाम राजनैतिक नेताओं द्वारा अत्यधिक दबाव और कई अपीलों के बावजूद 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई।

फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे –
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।

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