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कहानी उस महान महिला की जिसने निभाई थी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे अहम भूमिका

नई दिल्ली

*अरूणा आसिफ अली: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महान वृद्ध महिला*
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अरुणा आसिफ अली एक चमकता हुआ सितारा थी। आधुनिक भारत का इतिहास निरर्थक माना जाएगा अगर स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष में उनके योगदान का जिक्र न हो। वे एक बंगाली परिवार में अरुणा गांगुली के तौर पर पैदा हुई और उनका विवाह आसिफ अली नाम के एक प्रगतिशील बैरिस्टर और स्वतंत्रता संग्रामी के साथ हुआ जो आगे चलकर अमेरिका में भारत के प्रथम राजदूत बने। उनके द्वारा एक मुस्लिम के साथ विवाह किए जाने का शुरू में एतराज किया गया लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि स्वतंत्रता संग्राम में धर्म किसी प्रकार की बाधा नहीं था। वे एक भारतीय शिक्षाविद, राजनीतिक कार्यकर्ता तथा प्रकाशक थी।उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन(1942) के दौरान मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान मैं राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए भी याद किया जाता है। वह भारत की सांप्रदायिक सद्भावना का सटीक उदाहरण है।
अरूणा आसिफ अली को 1930 मे ‘नमक सत्याग्रह आंदोलन’ में हिस्सा लेने के लिए गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। उन्हें गांधी और इरविन के बीच 1931 में हुए समझौते के बाद भी जेल में ही रहना पड़ा जबकि इस समझौते के अंतर्गत सभी राजनीतिक कैदियों को छोड़ दिया गया था। लोगों के विरोध और गांधीजी के हस्तक्षेप के बाद अरूणा आसिफ अली को बाद में रिहा कर दिया गया। 1992 में आयोजित भारत छोड़ो आंदोलन की ‘स्वर्ण जयंती’ के अवसर पर (जब उनकी उम्र 83 साल की हो गई थी) उन्होने मुंबई में राष्ट्रीय ध्वज फहराकर इतिहास रचा। उन्होंने सी०पी०आई की महिला विंग-‘नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन विमेन'(NFIW) के गठन में एक अहम रोल अदा किया। सन 1958 में उन्हें दिल्ली का मेयर बनाया गया। स्वतंत्रता पश्चात उन्होंने महिलाओं में शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ-साथ उनके स्तर को ऊंचा उठाने का कार्य भी किया।
अरूणा आसिफ अली को ‘अंतर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार’, ‘जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार’, ‘पद्म विभूषण’ और ‘भारत रत्न’ जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। दिल्ली में एक अस्पताल व एक सड़क का नाम भी उन्हें ही समर्पित है।
भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदू मुस्लिम एकता एक धार्मिक-राजनीतिक अवधारणा है जो दो सबसे बड़े धार्मिक समूहों के सदस्यों को एक सांझे उद्देश्य लिए कार्य करने पर जोर देती है। हमें सांप्रदायिक ताकतों द्वारा की जाने वाली विभाजनकारी- राजनीति का शिकार नहीं बनना चाहिए और अरुणा आसिफ अली जैसे नेताओं द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर एकजुट रहना चाहिए।

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