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हर स्तर पर हुई महिला सशक्तिकरण की माँग लेकिन क्या हो पाया संभव , पढ़िए संपादकीय विशेष

नई दिल्ली । ( सोनू चौधरी ) 

महिला सशक्तिकरण का विषय हमेशा से नितिकारों,  मीडिया और विद्वानों के लिए बीच बहस का मुद्दा रहा है । ‘सशक्तिकरण’ सामान्य तौर पर एक व्यक्ति के पूर्ण विकास से है जो उसे अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सक्षम करता है।   लेकिन,  औरतों के सशक्तिकरण को मापने के लिए आवश्यक है कि वह स्वयं  के लिए क्या अच्छा है,  इसको पुनः परिभाषित कर सकें तथा सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अपने निर्णय लेने के रोल को पहचान सकें।  मुस्लिम औरतें आमतौर पर अपनी मान्यताओं के ताने-बाने एवं पुरुष – प्रधान परिवार के स्वरूप में सीमित होकर अपने समुदाय के आर्थिक पिछड़ेपन में फंस कर रह जाती है । किंतु  प्रश्न वही है कि क्या इस्लाम अपने संपूर्ण अर्थ में मुस्लिम औरतों के उत्थान को रोकता है या उस सामाजिक ताने-बाने और सामाजिक सांस्कृतिक रूढ़ियों, जो  मुस्लिम और हिंदू दोनों ही समाजों में व्याप्त है,  के कारण औरतें इस शक्ति को पाने से वंचित रह जाती है । जब कभी भी मुस्लिम औरतों के सशक्तिकरण की बहस होती है तो यह सामान्य निष्कर्ष निकाले जाते हैं की पूर्णतया उनका धर्म ही उन्हेें समाज में  डरे-सहमे से रोल अदा करने के लिए उकसाता है ना कि कथित तौर पर पक्षपाती सामाजिक तंत्र तथा दोषपूर्ण सरकारी नीतियां इसके लिए जिम्मेदार है । मुस्लिम महिलाएं धर्म के कारण नए सामाजिक बदलाव और आधुनिक प्रक्रिया को अपनाने से झिझकती हैं।  भारत में मुस्लिम समुदाय ने विकास संबंधी व संस्थागत रुखेपन  का सामना किया जिसके कारण उनकी औरतों की दशा, विशेषकर शिक्षा व रोजगार के मामलों में, अच्छी नहीं है । यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मुस्लिम समुदाय का संपूर्ण महिला वर्ग खासकर ग्रामीण परिवेश की औरतों को इन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।

इस्लाम मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण के मामले को प्रभावित करने से अछूता नहीं है।  किंतु भारत की विविधता पूर्ण – सांस्कृतिक व समाज में मात्र धर्म को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।  क्या वाकई मुस्लिम महिलाओं के लिए इस्लाम कोई स्थान देता है जिससे वे सिर्फ धार्मिक शिक्षा के क्षेत्र में पढ़ाई कर अपना कैरियर बना सकें ? चलिए,  इस विषय पर भारतीय संदर्भ में हम इतिहास की समीक्षा  करें।  जैसा कि अनेक अध्ययनों से पता चलता है की सरकार द्वारा निर्धारित की गई आरक्षण की योजनाओं से अन्य वर्गों की तुलना में हाशिये पर हुए मुस्लिम अल्पसंख्यकों की दशा बदल नहीं पाई है, इसका कारण दोषपूर्ण आरक्षण व्यवस्था है।  क्योंकि मुस्लिम समाज को सदा ही समरूपी समाज (Homegeneous society) के रूप में देखा जाता है तथा सामाजिक व आर्थिक स्तर  पर आधारित वर्गीकरण व उप- वर्गीकरण को नजरअंदाज कर दिया जाता है । इससे इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि मुसलमानों, खास तौर पर औरतों में, व्याप्त अशिक्षा के लिए धर्म का निम्नतम  रोल है । इस्लाम औरतों और आदमियों दोनों को स्वयं  को शिक्षित करने के लिए प्रेरित करता है ताकि वे अपनी सभ्यता के विकास में सक्रिय योगदान दे सकें।

इससे यह साबित होता है कि भारतीय मुसलमानों में सामाजिक रूढ़िवादिता और सांस्कृतिक संकीर्णता धर्म के माध्यम से नहीं आई बल्कि यह उन्हें ऐतिहासिक अनुभवों और सांझे सांस्कृतिक अतीत से मिले हैं । उदाहरण के लिए बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश का मुस्लिम समुदाय और केरल के मोपला मुसलमानों ने हिंदुओं में व्याप्त अति निंदनीय प्रथा – दहेज प्रथा को अपनाया हुआ है । अतः किसी धर्म को मात्र उसके संकीर्णतावादी रवैये के लिऐ  दोष देना और उसे मानने वाली औरतों को पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार ठहराना गलत है।  यह सत्य है कि मुस्लिम  औरतें अन्य समुदायों की औरतों के मुकाबले में शिक्षा प्राप्त करने के क्षेत्र में पीछे हैं l परंतु इसका मुख्य कारण आर्थिक पिछड़ापन और इस समुदाय का सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से हाशिए पर होना है।

सन् 2005 में, प्रधानमंत्री द्वारा गठित न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय समिति ने पाया कि मुस्लिम समाज का स्तर पहले से भी अधिक गिर गया है।  इसी तरह की रिपोर्ट न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र ने भी दी जिन्होंने सामाजिक न्याय व  सशक्तिकरण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 2005 में गठित भाषाएं धार्मिक अल्पसंख्यक आयोग की अध्यक्षता की थी । एक आंकड़े के अनुसार लगभग 48% भारतीय मुस्लिम औरतें  अनपढ़ हैं जो धार्मिक समुदायों में सबसे अधिक है ।  अध्ययन आगे दर्शातें हैं कि उच्च स्तरीय शिक्षा में मुस्लिम बच्चों का प्रतिशत भी सबसे कम है l  इनमें मुस्लिम लड़कियों का प्रतिशत नगण्य है। भारत में मुस्लिम औरतों के स्तर को सुधारने के लिए हर संभव ध्यान देने की जरूरत है।  औरतों को शक्ति प्रदान करने के लिए राजनीतिक,  शैक्षणिक और रोजगार स्तर पर अवसर देने के लिए विशेष कल्याण- योजनाएं  चलाई जाएं व उन्हें आरक्षण प्रदान किया जाए।  चूंकि भारत की जिम्मेदार मुस्लिम औरतें अपने अधिकारों और उनके लिए उपलब्ध योजनाओं से अनभिज्ञ हैं, एक विकेंद्रीकृत जागरूक कार्यक्रम चलाने की भी सख्त जरूरत है।

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